एक पाककला का जादूगर
और परोसगारी का बाजीगर
रोज सुबह खोले पिटारा
देख ललचाए जी हमारा
कोविड का समय है
हम महसूस करें बेसहारा
हिया हमारा टूट रहा
अब बन जाओ तुम रफ्फूगर
कभी शादियों की दावतें
कभी पार्टियों की जाम खोरी
कभी बेलन जैसे हथियार की
मन गुदगुदाती मसखरी
इतने बड़े-बड़े मसले
पर नहीं है मेरे पास असले
अब बन जाओ तुम शौरगर
कभी राजस्थान की दाल बाटी
कभी गुजरात के ढोकले
कभी पंजाब के छोले भटूरे
कभी बंगलुरु के डोसे
देखने के अब तक बहुत हो गए शोसे
कभी तो बनजाओ उदर पूरगर
देंगे हम दुआएं बनकर पसरगर।
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