हमारी पीढ़ी ने बहुत परिवर्तन देखे हैं और काफी संघर्ष भी किया है। हमारे सामने रोजगार के अवश्य ज्यादा अवसर थे आज के मुकाबले। हालात काफी खराब थे , स्कूल भी धर्म शालाओं में चलते थे, हमने स्कूल में अध्यापकों की काफी मार खाई है। मेरे प्राथमिक स्कूल में तो एक ही गुरुजी होते थे और वह गुंदी की ताजा टहनी से पिटाई करते थे और हमने उनकी रोटियां भी बनाई हैं। इसी तरह हमने कभी पैदल तो कभी ऊंट पर यात्राएं की हैं। बारात में भी ऊंट पर गए हैं। बारात में घी-चावल या हलवा, बस यही मीठा, और दाल या चने का पटोलिया, यही नमकीन, खाकर भी अपने आप को बहुत खुशकिस्मत महसूस किया है। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बारात में जाने के लिए घरवालों से जुगत भिड़ाने की कोशिश भी करते थे। उसके बाद बारात बड़ी बसों मैं जाने लगी और दूल्हा अलग से एक जीप में जाया करता था। शादी की कोई उम्र नहीं होती थी। 18 या 21 वर्ष वाला फार्मूला बाद में आया है। गांव में किसी के यहां जमाई आता था तो खूब महिलाएं इकट्ठी होती थी और दूल्हे की पूरी रैगिंग करती थीं। असल में महिलाओं का उद्देश्य जमाई की क्षमता और बुद्धि परीक्षण होता था। सवाल काफी जटिल मस...