१- शायद ग्यारहवीं कक्षा की बात है। एक छुट्टी के दिन हॉस्टल के चार साथियों मल्लू, रामलाल , मैं और एक अन्य को बीकानेर घूमने का फितूर चढ़ा। पैसे तो पास में ज्यादा होते नहीं थे और इसलिए यह तय हुआ कि सुबह की लोकल ट्रेन से बिना टिकट बीकानेर की यात्रा करेंगे और दिनभर बीकानेर की सैर करेंगे और शाम की लोकल ट्रेन (सूरतगढ़ वाली) से वापस आ जाएंगे। एक थैला लिया जिसमें सीट पर बिछानेके लिए एक चद्दर डाल ली और थर्ड क्लास डिब्बे में सवार हो गए। बिना टिकट वाले यात्री हर स्टेशन पर डिब्बे बदलते रहते हैं ताकि टीटीई से बच सके। इस तरह हम चारों दोस्त भी डिब्बे बदलते लेकिन हम पर टीटीई की नजर पड़ गई और उसने पीछा करना शुरू कर दिया। बेलासर स्टेशन से ट्रेन जब रवाना हुई तो टीटीई हमारे डिब्बे में चढ़ता दिखा तो दूसरे दरवाजे से हम चारों नीचे उतर गए और रेलवे स्टेशन के दूसरी तरफ भाग गए। इस जद्दोजहद में थैला ट्रेन में ही छूट गया। शाम की ट्रेन से वहीं से वापस आ गए। बीकानेर तो नहीं देखा लेकिन ₹100 की चद्दर का नुकसान अवश्य कर आये । यह चद्दर रामलाल की थी।😆 २-रामलाल ने ही मुझको फिल्में देखने का चस्का ...
शायरी में बातें करके यों हमें बेकरार ना कीजिए कोई दिन अच्छा देख इश्क का इजहार कर दीजिए देगें दुआएं दिल से बस उम्र गुजारने में शरीक हो जाइए भरकर आहों में ही सही थोड़ा सा प्यार करने दीजिए।