यह जरूरी नहीं हर उपवास शारीरिक सेहत के लिए ही हो कुछ उपवास सामाजिक सेहत की भेंट भी चढते हैं। मौके ऐसे कि ना उगलते बनता ना निगलते बनता दे दो सारी बधाईयां लेते रहो जम्हाईयां। शिकवों की बातें और सौगातें हैसियत की भेंट चढ़ती पुरानी-नई सब बातें। उठना पड़ता मजबूरी के बहाने ताकते रह जाते चेहरे नये-पुराने जानते वो भी हैं क्या हैं मायने इसे ही कहते हैं पहुंचो ठिकाने। सूकून मिला देख कुछ धोती वाले बीड़ियों के कश में खो गये निवाले सेहत अब वही जो उल्टी (कै) बचायह जरूरी नहीं हर उपवास शारीरिक सेहत के लिए ही हो कुछ उपवास सामाजिक सेहत की भेंट भी चढते हैं। मौके ऐसे कि ना उगलते बनता ना निगलते बनता दे दो सारी बधाईयां लेते रहो जम्हाईयां। शिकवों की बातें और सौगातें हैसियत की भेंट चढ़ती पुरानी-नई सब बातें। उठना पड़ता मजबूरी के बहाने ताकते रह जाते चेहरे नये-पुराने जानते वो भी हैं क्या हैं मायने इसे ही कहते हैं पहुंचो ठिकाने। सूकून मिला देख कुछ धोती वाले बीड़ियों के कश में खो गये निवाले सेहत अब वही जो उल्टी (कै) बचाले। डीजे अब भी कान फाड़े लगता सुनपन रहेगा एक पखवाड़े लिख कर मोहन अब क्या उखाड़े।। वें। डीजे ...