सागै ले लिन्हो म्है पीपो नाम राखलियो हो दीपो।। बात 1979 की है जब मैंने रघुनाथ विद्यालय रतनगढ़ में प्रवेश लिया था और घर वालों ने बड़े लाड़-प्यार से यह पीपा दिलवाया था। हालांकि आज पीपा मोजूद है, पीपा दिलाने वाले अब इस दुनिया में नहीं हैं। तब यह पीपा ही रघुनाथ विद्यालय के हॉस्टल में मेरी तिजोरी व मेरा रसोईघर का स्टोर हुआ करता था। इसमें नमक, मिर्च, हल्दी, धनिया की छोटी-छोटी पोटली, आटा की कोथली और घी का छोटा सा डिब्बा रखकर इसके छोटी सी तालकी (छोटा ताला) लगा दिया करता था। इस पीपे की दास्तान यह है की इसमें घी का डिब्बा रखा तो भरा हुआ जाता था लेकिन हमेशा इसमें से निकलता खाली ही था। खास बात यह भी है कि इसकी तालकी हमेशा एकदम उसी हालत में लगी हुई मिलती थी जैसी मैं लगाकर छोड़ता था। बहुत शातिर दिमाग मिस्त्री थे मेरे हॉस्टल मेट। डर के मारे किसी को बता भी नहीं सकते था कि मेरा घी कोई हलवा बनाकर खा गया। क्योंकि उल्टा मुझ पर ही इल्जाम आना था कि तू अकेले-अकेले ही खाना चाहता है। घी छूमंतर होने के लिए कोई ज्यादा समय नहीं लगता था। जिस दिन लाया उसी दिन या तो जैसे ही क्लास में गया पीछे से...
इस साल पन्द्रह अगस्त ऐसा आया दो माह के शिशु ने यों झंडा फहराया नज़रें सबकी उस पर लगी जब बाहों से झंडा लहराया सफेद लिबास साफ दिल दिल पर तमगा आजादी का जेन जी मां का है लाल विस्मित करता दृश्य कमाल भविष्य की तस्वीर देखकर मैं और राष्ट्र मालामाल मेरे देश में डाटा बहुत है शक्ति है सही उपयोग नया जमाना नया वृतांत प्यारा सा पल सुखद संयोग।।