11वीं कक्षा में पानी के होद और सीढ़ियों के पास की हाल (Hall) में हम तीन साथी रहते थे। रघुनाथ विद्यालय छात्रावास के उत्तर साइड में रघुनाथ विद्यालय (जूनियर वर्ग),पूर्व साइड में मुख्य सड़क के पार अग्रसेन भवन और उससे थोड़ा नीचे सदर थाना हुआ करता था। जिसके प्रीतमसिंह जी सोनी शायद SHO हुआ करते थे।दक्षिण साइड में श्री रामचंद्र मंदिर गनेरी वाला और पश्चिम साइड में ऊपर की मंजिल से कुछ घर दिखते थे। कहने का मतलब है शांत और निर्विघ्न वाला स्थान था । 11वीं तक आते-आते मेरी भी किशोरावस्था परवान पर थी। ऐसे में मन में खूब विचार और सपने आते रहते थे। वैसे शुरू से ही मैं एकान्त प्रिय जीव था । विज्ञान का विद्यार्थी था तो किताबों में डूबना भी स्वाभाविक था। फिजिक्स को बार-बार पढ़ते रहता, कभी समझ आती तो कभी झूठी माथा-पच्ची। उलझन भरे पलों में भी कुछ ऐसा था जो सुबह-सुबह देख लेने पर मन में ताजगी पैदा करता था। उनमें एक थे श्री रामचंद्र मंदिर गनेड़ी वाला के महंत जो एक शारीरीक शोष्ठव की अद्भुत मिसाल थे और सुबह-सुबह मंदिर के खूबसूरत उद्यान में घूमते हुए दिखाई देते थे। वहीं दूसरी तरफ पीछे के घर में एक...
सागै ले लिन्हो म्है पीपो नाम राखलियो हो दीपो।। बात 1979 की है जब मैंने रघुनाथ विद्यालय रतनगढ़ में प्रवेश लिया था और घर वालों ने बड़े लाड़-प्यार से यह पीपा दिलवाया था। हालांकि आज पीपा मोजूद है, पीपा दिलाने वाले अब इस दुनिया में नहीं हैं। तब यह पीपा ही रघुनाथ विद्यालय के हॉस्टल में मेरी तिजोरी व मेरा रसोईघर का स्टोर हुआ करता था। इसमें नमक, मिर्च, हल्दी, धनिया की छोटी-छोटी पोटली, आटा की कोथली और घी का छोटा सा डिब्बा रखकर इसके छोटी सी तालकी (छोटा ताला) लगा दिया करता था। इस पीपे की दास्तान यह है की इसमें घी का डिब्बा रखा तो भरा हुआ जाता था लेकिन हमेशा इसमें से निकलता खाली ही था। खास बात यह भी है कि इसकी तालकी हमेशा एकदम उसी हालत में लगी हुई मिलती थी जैसी मैं लगाकर छोड़ता था। बहुत शातिर दिमाग मिस्त्री थे मेरे हॉस्टल मेट। डर के मारे किसी को बता भी नहीं सकते था कि मेरा घी कोई हलवा बनाकर खा गया। क्योंकि उल्टा मुझ पर ही इल्जाम आना था कि तू अकेले-अकेले ही खाना चाहता है। घी छूमंतर होने के लिए कोई ज्यादा समय नहीं लगता था। जिस दिन लाया उसी दिन या तो जैसे ही क्लास में गया पीछे से...