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मार्क टली

मार्क्स (निशान ) ही रह गये टली चला गया बीबीसी का भारत में स्थायी चेहरा बनकर रह गया चमड़ी सफेद थी पर भारत में घुल गया मिट्टी से लगाव करके इंग्लैंड को भूल गया लेखन और पत्रकारिता में पदम रत्न पा गया रत्नों का यह खजाना कल दिल दुखा गया।। ऊं शांति /RIP
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चौथाई शताब्दी

बीत गई प्रथम चौथाई इक्कीसवीं शताब्दी की देख- देख चाल इसकी आंखें रह गई फट्टी सब की कम्प्यूटर आये, आईटी आई आये बहुत ही स्मार्ट फोन मशीनों को करें मशीनें ही नियंत्रित मनुष्य तो रह गया लिपटे हुए फोन रुपया शर्मा रहा देखकर डॉलर दोनों ही डर रहे कि चीन है बोलर पढ़ाई में गुण नहीं बचा कोर्स हो गये चीज खरीदारी की बेरोजगार ढूंढ रहे कोई चाकरी खुद्दारी की मिले कहां ऐसा वातावरण जहां पर्चे बिकते माफिक तरकारी की प्राइवेट में टिक नहीं सकते अब छोटे काम धंधे नुक्कड़ की प्रचूनी गायब बड़े मार्ट में पंहुचते सब होकर अंधे नकदी का व्यवहार बंद‌ सा है यूपीआई से चुकाते हैं बंदे आटा भूल अपनाया डाटा रिश्ते नाते सब हो गये टाटा चौथाई में इतना देख लगता है आधी तक गायब हो जायेगा शायद अरावली का भाटा ।।

एक स्मृति

तीन साल में बदल गये सारे तांगड़-पटिये लेख विधाता लिखते हैं  काहे दोजख रखिये।।

धन्यवाद

कल जन्मदिन पर सैंकड़ों आई शुभकामनाएं सभी ने दिल से भेजी अनन्त मनोकामनाएं जो मिला प्यार वह था बड़ा‌ अनमोल रत्न मैं सहेज कर रखूंगा इसे करके पूरे जत्न रेकर्स ने याद किया किसी ने डिसेंट सोच से, किसी ने लौंडा बोल के बिजली वालों ने याद किया फिर से दिल खोल के चट्ठा साहब ने साहित्य की ओर से भेजा संदेश चासनी इसकी घोल के वकीलों में बिंद्रा साहब ने सुबह ही घनघनाया फोन वाहे गुरु बोल के GLA वालों ने खूब बनाई रेसिपी मेरी केक और पार्टी को साथ तोल के बाकी सब तो बच्चे -बच्चियां हैं कहा हैप्पी बर्थडे अंकल‌ बोल के कशिश दिल में रह गयी रंगा के उस फोन की सबसे पहले जो विश करता था मोहन प्यारे बोल के।।

नये साल का अभिनंदन

सम्मान रखने को एक डायरी काफी है  लिखने को फलसफे बड़ी मुआफिक है।।

मकरसंक्रांति

मकर संक्रांति ने लोहड़ी को भी  समेट लिया अपने आंचल में  खाकर तिल-मूंगफली उसकी चढ़ गये छतों पर पतंगों के जूनून में  दुकानें बंद करके लगे इस व्यापार में  दो-दो साल के बच्चे भी सीटी वाले जूते पहनकर लगे चरखी को लटाने में  लड़कियां बड़ी फुर्ती से पतंगें उड़ाते लगतीं  जैसे स्वयं ही पतंगें हो जिनका संतुलन  मानो किसी का पोनीटेल, किसी का चोटी में  पावर लाईने धागों से फाल्ट हुई पचासों बिजली वाले जुट गये पतंग बनकर हटाने में  रात हुई ड्रोन के माफिक गुब्बारों वाले पतंग  लगे शहर का आकाश सजाने में  नीचे सड़कों पर लोगों ने ऐसी की आतिशबाजी लगा शहर बंट गया है रंग-बिरंगी दीवारों में  बचे लोग नजारे ही देखते रहे दिनभर दबा दांतों तले उंगली  खाना तो बस आज पड़ा रहा अपने बरतनों में  यह शहर है गुलाबीनगर जनाब  रंग तो बसा है इसकी हर धड़कन में आतिशबाजी के शोर से शायद आज परिंदों ने बदल लिये ठिकाने इसीलिए आज उनकी बची रहीं जाने।।

आजमाइश

यह जरूरी तो नहीं हम चाहें वह हो जाये लगे रहिए पूरी लगन से हो जाये चाहा तो अच्छा नहीं तो तब तक विचार बदल जायें तो और भी अच्छा इसे ही राह कहते हैं आजमाना जमाने से पहले खुद को अच्छा है।।