हमारी पीढ़ी ने बहुत परिवर्तन देखे हैं और काफी संघर्ष भी किया है। हमारे सामने रोजगार के अवश्य ज्यादा अवसर थे आज के मुकाबले। हालात काफी खराब थे , स्कूल भी धर्म शालाओं में चलते थे, हमने स्कूल में अध्यापकों की काफी मार खाई है। मेरे प्राथमिक स्कूल में तो एक ही गुरुजी होते थे और वह गुंदी की ताजा टहनी से पिटाई करते थे और हमने उनकी रोटियां भी बनाई हैं। इसी तरह हमने कभी पैदल तो कभी ऊंट पर यात्राएं की हैं। बारात में भी ऊंट पर गए हैं। बारात में घी-चावल या हलवा, बस यही मीठा, और दाल या चने का पटोलिया, यही नमकीन, खाकर भी अपने आप को बहुत खुशकिस्मत महसूस किया है। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बारात में जाने के लिए घरवालों से जुगत भिड़ाने की कोशिश भी करते थे। उसके बाद बारात बड़ी बसों मैं जाने लगी और दूल्हा अलग से एक जीप में जाया करता था। शादी की कोई उम्र नहीं होती थी। 18 या 21 वर्ष वाला फार्मूला बाद में आया है। गांव में किसी के यहां जमाई आता था तो खूब महिलाएं इकट्ठी होती थी और दूल्हे की पूरी रैगिंग करती थीं। असल में महिलाओं का उद्देश्य जमाई की क्षमता और बुद्धि परीक्षण होता था। सवाल काफी जटिल मस...
कुलदीप हमारी कक्षा के दस प्रमुख होनहार छात्रों में से था। वह हमेशा से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में सबसे आगे था। मुझे याद आता है, एक बार रघुनाथ विद्यालय (मीडिल स्कूल बिल्डिंग में) एक लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। उसमें मैंने भी भाग लिया था और मैं तीन स्थानों में नहीं आया था। कुलदीप उसमें द्वितीय आया था और माला बोझमानी प्रथम आई थी। तब से ही मुझे एहसास हो गया था कि अभिव्यक्ति के मामले में मैं उसके सामने कहीं नहीं टिकता। वह छात्रावास में नियमित रूप से आता रहता और खासतौर पर उसका मल्लूराम से विशेष लगाव था। हालांकि वह सबको समझने और उसमें सबसे सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखने की कला है। मुझे रतनगढ़ को असली जानने का मौका समय- समय पर मिलता रहा। स्कूल के दिनों मैं बंशीधर जी शर्मा (स्टेट स्कूल के हेडमास्टर), रतनलाल जी जोशी ( रघुनाथ में बैग वाले), गोपालकृष्णजी शर्मा (रेल्वे बुक स्टाल वाले)से सबसे ज्यादा प्रभावित था। सेवाकाल के दिनों में यह जानने का मौका मिला कि चम्पा लाल जी उपाध्याय, धनाधीश जी वैद्य का रतनगढ़ के शिक्षा और सामाजिक जीवन में एक विशेष महत्व व छाप है। उस समय मैं सोचा करता था कि क्या हम ...