रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना....यह मुकद्दर का सिकंदर गाने का एक अंतरा है। गाना पुराना है और आज के जेन-जी के जमाने में तो जितना यह गाना धीमा है, उतने समय में तो लोग साथी ही बदल डालें। जिसे रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की कॉरिडोर में अक्सर सुना जाता था। हालांकि मेरी आवाज उतनी सुरीली नहीं है जितनी यह उस कॉरिडोर में सुनी जाती थी, क्योंकि गाने वाला कोई और था, जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं। यह गाना कोई बाथरूम में भी नहीं गया जाता था। यह गाना सुनाई देने का मतलब यह था कि अब किसी न किसी के ऊंगली( In modern time poke) किया जाएगा। यह उस हॉस्टल मेट की ही विशेषता थी कि पढ़ाई में बढ़िया होने के साथ-साथ वह बुली (Bully) भी बेहतरी से कर लिया करता था। यह उस विद्यार्थी की विशेष योग्यता थी जो उसे दूसरों से अलग बनाती थी। हालांकि उसके साथ एक उत्प्रेरक भी हर समय जुड़ा रहता था। जब भी रासायनिक क्रिया को धीमा या तेज करना होता था वह उत्प्रेरक स्वयं प्रेरित हो जाता था। आज यूं ही बैठे उस मूल तत्व और उत्प्रेरक की याद आ गई।आशा है आप लोगों को भी कुछ याद आए या आपके साथ भी क...
11वीं कक्षा में पानी के होद और सीढ़ियों के पास की हाल (Hall) में हम तीन साथी रहते थे। रघुनाथ विद्यालय छात्रावास के उत्तर साइड में रघुनाथ विद्यालय (जूनियर वर्ग),पूर्व साइड में मुख्य सड़क के पार अग्रसेन भवन और उससे थोड़ा नीचे सदर थाना हुआ करता था। जिसके प्रीतमसिंह जी सोनी शायद SHO हुआ करते थे।दक्षिण साइड में श्री रामचंद्र मंदिर गनेरी वाला और पश्चिम साइड में ऊपर की मंजिल से कुछ घर दिखते थे। कहने का मतलब है शांत और निर्विघ्न वाला स्थान था । 11वीं तक आते-आते मेरी भी किशोरावस्था परवान पर थी। ऐसे में मन में खूब विचार और सपने आते रहते थे। वैसे शुरू से ही मैं एकान्त प्रिय जीव था । विज्ञान का विद्यार्थी था तो किताबों में डूबना भी स्वाभाविक था। फिजिक्स को बार-बार पढ़ते रहता, कभी समझ आती तो कभी झूठी माथा-पच्ची। उलझन भरे पलों में भी कुछ ऐसा था जो सुबह-सुबह देख लेने पर मन में ताजगी पैदा करता था। उनमें एक थे श्री रामचंद्र मंदिर गनेड़ी वाला के महंत जो एक शारीरीक शोष्ठव की अद्भुत मिसाल थे और सुबह-सुबह मंदिर के खूबसूरत उद्यान में घूमते हुए दिखाई देते थे। वहीं दूसरी तरफ पीछे के घर में एक...