अमीरी और ग़रीबी में एक समानता है और वह यह कि मौत सबको आती है। यह उद्धरण आई.जे. नाहल साहब की पुस्तक गुस्ताखियां से है। नाहल साहब व्यक्तित्व, ज्ञान , लेखन और अभिव्यक्ति की कला की दृष्टि से इस दुनिया के एक अमीर इंसान थे। मेरा उनके घर हिसार जाना-आना पूरे मेरे पांच साल के इंजीनियरिंग कोर्स के दौरान रहा। अन्तिम बार वर्ष 2019 में मैं एल्यूमनाई गेट-टुगेदर में जाते समय उनसे मिलकर कुरुक्षेत्र गया था। उनका लिखने का क्रम तब भी जारी था। वह एक अच्छे वक्ता थे। उनका स्नेह मुझ पर हमेशा बना रहा। आजकल तो पत्र कोई लिखता नहीं इसलिए मैंने उनके द्वारा 2004-2005 में भेजा गया एक बहुत ही सुन्दर लेखनी वाला पत्र आज भी संभाल कर रखा है। लगभग 93 की उम्र में उनका जाना मेरे लिए एक लेखन के लिए प्रेरणास्रोत का जाना व्यक्तिगत क्षति और दुखद है। भगवान उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करें और पूरे नाहल परिवार को यह दुःख सहन करने की शक्ति दे। उनके द्वारा लिखित कुछ व्यंग्योक्तियां/ उक्तियां साझा कर रहा हूं,जो हमारा मार्गदर्शन करेंगी।
हमारी पीढ़ी ने बहुत परिवर्तन देखे हैं और काफी संघर्ष भी किया है। हमारे सामने रोजगार के अवश्य ज्यादा अवसर थे आज के मुकाबले। हालात काफी खराब थे , स्कूल भी धर्म शालाओं में चलते थे, हमने स्कूल में अध्यापकों की काफी मार खाई है। मेरे प्राथमिक स्कूल में तो एक ही गुरुजी होते थे और वह गुंदी की ताजा टहनी से पिटाई करते थे और हमने उनकी रोटियां भी बनाई हैं। इसी तरह हमने कभी पैदल तो कभी ऊंट पर यात्राएं की हैं। बारात में भी ऊंट पर गए हैं। बारात में घी-चावल या हलवा, बस यही मीठा, और दाल या चने का पटोलिया, यही नमकीन, खाकर भी अपने आप को बहुत खुशकिस्मत महसूस किया है। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बारात में जाने के लिए घरवालों से जुगत भिड़ाने की कोशिश भी करते थे। उसके बाद बारात बड़ी बसों मैं जाने लगी और दूल्हा अलग से एक जीप में जाया करता था। शादी की कोई उम्र नहीं होती थी। 18 या 21 वर्ष वाला फार्मूला बाद में आया है। गांव में किसी के यहां जमाई आता था तो खूब महिलाएं इकट्ठी होती थी और दूल्हे की पूरी रैगिंग करती थीं। असल में महिलाओं का उद्देश्य जमाई की क्षमता और बुद्धि परीक्षण होता था। सवाल काफी जटिल मस...