छूट गए वे गोरे - गोरे धोरे
जिन पर बनी टापियों में बीते दिन सुनहरे
जहां-तहां
ठहरी नग्न पदचापें
पानी के छिड़काव वाली
ठंडाई फिर से ताकें
यादों के झरोखे से ताकते
आज भी वो चील झपटे के घेरे
भूले...
वह प्राकृतिक खेती
होती थी जो
गोबर खाद सेती
रोहीड़े के पेड़ों पर वो रंगीले फूल
और ऊपर ताकते वो बकरियों के चेहरे
रेत पर बनी
वो हसीन लकीरें
जो लिखती थी
सबकी उम्दा तकदीरें
ऊंटों के टोले, देते थे हिचकोले
जेहन में आज भी जिंदा हैं वो निराले फेरे
अगस्त 84 एडमिशन ,रैगिंग हुई भरपूर, अभिमन्यु भवन तीर्थ था ,आस्था थी भरपूर। खिचाई तो बहाना था ,नई दोस्ती का तराना था, कुछ पहेलियों के बाद ,खोका एक ठिकाना था । भट्टू ,रंगा ,पिंटू ,निझावन ,मलिक ,राठी , सांगवान और शौकीन इतने रोज पके थे, रॉकी ,छिकारा ,राठी ,लूम्बा भी अक्सर मौजूद होतेथे । मेस में जिस दिन फ्रूट क्रीम होती थी, उस दिन हमें इनविटेशन पक्की थी। वह डोंगा भर - भर फ्रूट क्रीम मंगवाना, फिर ठूंस ठूंस के खिलाना बहुत कुछ अनजाना था, अब लगता है वह हकीकत थी या कोई फसाना था ।। उधर होस्टल 4 के वीरेश भावरा, मिश्रा, आनंद मोहन सरीखे दोस्त भी बहुमूल्य थे , इनकी राय हमारे लिए डूंगर से ऊंचे अजूबे थे। दो-तीन महीने बाद हमने अपना होश संभाला, महेश ,प्रदीप ,विनोद और कानोडिया का संग पाला । फर्स्ट सेमेस्टर में स्मिथी शॉप मे डिटेंशन आला ।। हमें वो दिन याद हैं जब नाहल, नवनीत,विशु शॉप वालों से ही जॉब करवाने मे माहिर थे , तभी से हमें लगा ये दोस्ती के बहुत काबिल थे । थर्ड सेम में आकाश दीवान की ड्राइंग खूब भायी थी, इसीलिए ला ला कर के खूब टोपो पायी थी। परीक्षा की बारी आई तो
Comments
Post a Comment