जब बादल गरजें उमड़ - घुमड़
बरसात में लगता है तुम्हीं हो
जब दोस्त मिले और चेहरे खिलें
उस मिलाप की उमंग तुम्हीं हो
जब किसी बुजुर्ग को सहारा
कोई नौजवान दे
उस सहारे की प्रेरणा लगता है तुम्हीं हो
कोई बच्चा मां के आंचल में सिमटे
उस बच्चे का विश्वास तुम्हीं हो
रात आए और तारे छायें
वो रोशन रैना तुम्हीं हो
उषा आए और लाली लाये
उस लाली में लगता है तुम्हीं हो
कलम लेकर लिखने बैठूं
जो शब्द उतरें वह तुम्हीं हो
जब तक लिखना जारी है
तू कहां मुझसे न्यारी है।।
अगस्त 84 एडमिशन ,रैगिंग हुई भरपूर, अभिमन्यु भवन तीर्थ था ,आस्था थी भरपूर। खिचाई तो बहाना था ,नई दोस्ती का तराना था, कुछ पहेलियों के बाद ,खोका एक ठिकाना था । भट्टू ,रंगा ,पिंटू ,निझावन ,मलिक ,राठी , सांगवान और शौकीन इतने रोज पके थे, रॉकी ,छिकारा ,राठी ,लूम्बा भी अक्सर मौजूद होतेथे । मेस में जिस दिन फ्रूट क्रीम होती थी, उस दिन हमें इनविटेशन पक्की थी। वह डोंगा भर - भर फ्रूट क्रीम मंगवाना, फिर ठूंस ठूंस के खिलाना बहुत कुछ अनजाना था, अब लगता है वह हकीकत थी या कोई फसाना था ।। उधर होस्टल 4 के वीरेश भावरा, मिश्रा, आनंद मोहन सरीखे दोस्त भी बहुमूल्य थे , इनकी राय हमारे लिए डूंगर से ऊंचे अजूबे थे। दो-तीन महीने बाद हमने अपना होश संभाला, महेश ,प्रदीप ,विनोद और कानोडिया का संग पाला । फर्स्ट सेमेस्टर में स्मिथी शॉप मे डिटेंशन आला ।। हमें वो दिन याद हैं जब नाहल, नवनीत,विशु शॉप वालों से ही जॉब करवाने मे माहिर थे , तभी से हमें लगा ये दोस्ती के बहुत काबिल थे । थर्ड सेम में आकाश दीवान की ड्राइंग खूब भायी थी, इसीलिए ला ला कर के खूब टोपो पायी थी। परीक्षा की बारी आई तो
श्रद्धांजलि.....
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