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कितनी सब्र‌‌ करूं ?

कितनी सब्र करूं, मैं कितनी सब्र करूं?
सूरज की तरह उठकर, कितनी बार वापस गिरूं?
रोज उठने पर वही क्रिया,
वही की वही दिनचर्या,
वहीं पहाड़ सा‌ दिनो का बोझ,
किस पर‌ बोझ‌ धरूं?
मैं कितनी सब्र करूं ?
चारों तरफ नीरस सी हंसी,
झूठे अपनापन की फांसी,
रोज बिजली का आना-जाना,
मैं कितनी सब्र करूं?
उत्पात मचाती बेहूदी खबरें,
धीरे- धीरे तपाती‌  खबरें,
भजनी साठी जलोटा की खबरें,
प्रियंका जोनास की खबरें,
खरे और ख़ोटों की खबरें,
मैं किस पर विश्वास करूं?
मैं कितनी सब्र करूं?
रोज सब्जी का थैला हाथ में,
रोज राशन की लाइन में,
रोज रूपए- डालर का झगड़ा,
रोज बीमारी के नाम का लफड़ा,
रोज धर्म के नाम पर फूट,
मैं किस पर विश्वास करूं?
मैं कितनी सब्र करूं?

Comments

  1. आम आदमी की व्यथा अति उत्तम शब्दों में

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  2. Right G.But khushiyan bhi khud hi talaashni Hoti hn.Kuan kabhi pyase k paas nhi jaata.

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