होरी, धनिया, सीलिया पिसते रहे हर बार तंखा, मालती ,मेहता समझते हैं जमाने की तलवार नोखेराम, पटनेश्वरी खेले भ्रष्टाचार अंताक्षरी राय साहब को फुर्सत नहीं क्या जनता पर गुजर रही फसल ऋण पर ही उगती पकते-पकते ब्याज पर लुट जाय मूल ऋण और लगान पर होरी के प्राण सूख जाय गोदान नाम का भ्रष्टाचार मरने के बाद भी बचा हुआ रह जाय बीस आने भर चुकाते ही धनिया पछाड़ खा निढाल हो जाय मार्मिक लिखी मुंशी प्रेमचंद खेतिहरों की आंखें भर आय।।