दिन बीतते हैं गालों के उजाले की तपन के ख्वाब में
रात बीतती है केशों की अंधेरी छांव के स्वप्न में
मन को हम सदा तेरे लिए करते हैं साफ
चाहे जमाना रूठे या कर दे मुझे माफ
तुझे खिलता देखें जैसे नभ में तारे
इसी से दूर होते हैं कष्ट मेरे सारे
अनोखी बात है तेरे प्रेम बंधन में
उलझ कर भी मगन रहते हैं इस बहके चमन में
हमें तो आंसूओं से सींचना है पथ तेरे आगमन का
यही तो इलाज है मेरी इस उलझन का।
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