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जिसकी यादें जिंदा है,वह इंसान मरकर भी जिंदा है ।

ओ मैं इस मामले में काफी अभागा हूं कि 235 सदस्यों के NIT कुरूक्षेत्र के 1984 के बैचमेट में से सिर्फ दो के ही माता-पिता को जानने और आशीर्वाद लेने का मौका मिला। उनमें से एक अभिजीत नाहल के माता-पिता, जिनका मुझ पर आजीवन आशीर्वाद रहा।  दूसरे अनिल नेगी के माता-पिता से मुलाकात विद्यार्थी जीवन के दौरान नहीं, बल्कि कॉर्बेट नेशनल टाइगर रिजर्व के भ्रमण के दौरान हुई।          हम उस पीढ़ी में से हैं जो अभी भी कभी-कभार भ्रमण पर जाते हैं और किसी दोस्त के आग्रह है पर उनके घर में वास कर लेते हैं। ऐसे ही 2021 में मुझे 3 दिन रामनगर (उत्तराखंड ) में अनिल नेगी के घर पर रुकने का अवसर मिला और अंकल और आंटी से मुखातिब होने और आशीर्वाद लेने का अवसर प्राप्त हुआ।      आंटी जी (अनिल नेगी की माताजी) बहुत ही हाजिर जवाब, जिंदा दिल और विनोद से भरपूर व्यक्तित्व की धनी थी। आज जब उनके देहावसान का समाचार मिला तो सारे दृश्य और बातें फिर से आंखों के सामने उतर आये। आंटी जी में यह खूबी थी कि वह मेहमान को मेहमान महसूस नहीं होने देती थी, बल्कि कुछ ही मिनट में घर का सदस्य बन...

नमन

चूरू जिले के जाने-माने विधिवेत्ता, एक दूरदर्शी सोच के धनी, हर वर्ग और हर समाज के हर तबके में पैठ रखने वाले विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी‌ श्री भीमनाथजी सिद्ध को उनकी पांचवीं पुण्य तिथि पर नमन 🙏🙏

Representation in democracy

Now we can also say that we have a representation in democracy. Saale Sahab Hansraj Sidh's wife got elected from ward No. 26 of Sardarshahar Municipal Council. Congratulations and best of luck 💐

Eleventh Punyatithi

"Gone from sight, but never from the heart.” On 11th Punyatithi Naman🙏🙏

अमीरी -गरीबी का समानता

अमीरी और ग़रीबी में एक समानता है और वह यह कि मौत सबको आती है। यह उद्धरण आई.जे. नाहल साहब की पुस्तक गुस्ताखियां से है। नाहल साहब व्यक्तित्व, ज्ञान , लेखन और अभिव्यक्ति की कला की दृष्टि से इस दुनिया के एक अमीर इंसान थे। मेरा उनके घर हिसार जाना-आना पूरे मेरे पांच साल के इंजीनियरिंग कोर्स के दौरान रहा।  अन्तिम बार वर्ष 2019 में मैं एल्यूमनाई गेट-टुगेदर में जाते समय उनसे मिलकर कुरुक्षेत्र गया था। उनका लिखने का क्रम तब भी जारी था। वह एक अच्छे वक्ता थे। उनका स्नेह मुझ पर हमेशा बना रहा। आजकल तो पत्र कोई लिखता नहीं इसलिए मैंने उनके द्वारा 2004-2005 में भेजा गया एक बहुत ही सुन्दर लेखनी वाला पत्र आज भी संभाल कर रखा है। लगभग 93 की उम्र में उनका जाना मेरे लिए एक लेखन के लिए प्रेरणास्रोत का जाना व्यक्तिगत क्षति और दुखद है।  भगवान उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करें और पूरे नाहल परिवार को यह दुःख सहन करने की शक्ति दे। उनके द्वारा लिखित कुछ व्यंग्योक्तियां/ उक्तियां साझा कर रहा हूं,जो हमारा मार्गदर्शन करेंगी।

रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से

हमारी पीढ़ी ने बहुत परिवर्तन देखे हैं और काफी संघर्ष भी किया है। हमारे सामने रोजगार के अवश्य ज्यादा अवसर थे आज के मुकाबले। हालात काफी खराब थे , स्कूल भी धर्म शालाओं में चलते थे, हमने स्कूल में अध्यापकों की काफी मार खाई है। मेरे प्राथमिक स्कूल में तो एक ही गुरुजी होते थे और वह गुंदी की ताजा टहनी से पिटाई करते थे और हमने उनकी रोटियां भी बनाई हैं। इसी तरह हमने कभी पैदल तो कभी ऊंट पर यात्राएं की हैं। बारात में भी ऊंट पर गए हैं। बारात में घी-चावल या हलवा, बस यही मीठा, और दाल या चने का पटोलिया, यही नमकीन, खाकर भी अपने आप को बहुत खुशकिस्मत महसूस किया है। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बारात में जाने के लिए घरवालों से जुगत भिड़ाने की कोशिश भी करते थे। उसके बाद बारात बड़ी बसों मैं जाने लगी और दूल्हा अलग से एक जीप में जाया करता था। शादी की कोई उम्र नहीं होती थी। 18 या 21 वर्ष वाला फार्मूला बाद में आया है। गांव में किसी के यहां जमाई आता था तो खूब महिलाएं इकट्ठी होती थी और दूल्हे की पूरी रैगिंग करती थीं। असल में महिलाओं का उद्देश्य जमाई की क्षमता और बुद्धि परीक्षण होता था। सवाल काफी जटिल मस...

कुलदीप व्यास को जैसा मैं समझ पाया

कुलदीप हमारी कक्षा के दस प्रमुख होनहार छात्रों में से था। वह हमेशा से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में सबसे आगे था। मुझे याद आता है, एक बार रघुनाथ विद्यालय (मीडिल स्कूल बिल्डिंग में) एक लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। उसमें मैंने भी भाग लिया था और मैं तीन स्थानों में नहीं आया था। कुलदीप उसमें द्वितीय आया था और माला बोझमानी प्रथम आई थी। तब से ही मुझे एहसास हो गया था कि अभिव्यक्ति के मामले में मैं उसके सामने कहीं नहीं टिकता। वह छात्रावास में नियमित रूप से आता रहता और खासतौर पर उसका मल्लूराम से विशेष लगाव था। हालांकि वह सबको समझने और उसमें सबसे सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखने की कला है। मुझे रतनगढ़ को असली जानने का मौका समय- समय पर मिलता रहा। स्कूल के दिनों मैं बंशीधर जी शर्मा (स्टेट स्कूल के हेडमास्टर), रतनलाल जी जोशी ( रघुनाथ में बैग वाले), गोपालकृष्णजी शर्मा (रेल्वे बुक स्टाल वाले)से सबसे ज्यादा प्रभावित था। सेवाकाल के दिनों में यह जानने का मौका मिला कि चम्पा लाल जी उपाध्याय, धनाधीश जी वैद्य का रतनगढ़ के शिक्षा और सामाजिक जीवन में एक विशेष महत्व व छाप है। उस समय मैं सोचा करता था कि क्या हम ...

चीनी का भाव

गन्ना गया एथेनॉल में चीनी भाव चढ़े चोटी वाहन हुए कबाड़ अब मरम्मत खींचे लंगोटी विदेश से चीनी मंगाना बक- बक‌ करना झूठी वाह रे! नीति निर्माताओं कैसे होगी‌ दीवाली मीठी।।

रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से

रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना....यह मुकद्दर का सिकंदर गाने का एक अंतरा है। गाना पुराना है और आज के जेन-जी के जमाने में तो जितना यह गाना धीमा है, उतने समय में तो लोग साथी ही बदल डालें। जिसे रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की कॉरिडोर में अक्सर सुना जाता था। हालांकि मेरी आवाज उतनी सुरीली नहीं है जितनी यह उस कॉरिडोर में सुनी जाती थी, क्योंकि गाने वाला कोई और था, जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं। यह गाना कोई बाथरूम में भी नहीं गया जाता था। यह गाना सुनाई देने का मतलब यह था कि अब किसी न किसी के ऊंगली( In modern time poke) किया जाएगा। यह उस हॉस्टल मेट की ही विशेषता थी कि पढ़ाई में बढ़िया होने के साथ-साथ वह बुली (Bully) भी बेहतरी से कर लिया करता था। यह उस विद्यार्थी की विशेष योग्यता थी जो उसे दूसरों से अलग बनाती थी। हालांकि उसके साथ एक उत्प्रेरक भी हर समय जुड़ा रहता था। जब भी रासायनिक क्रिया को धीमा या तेज करना होता था वह उत्प्रेरक स्वयं प्रेरित हो जाता था। आज यूं ही बैठे उस मूल तत्व और उत्प्रेरक की याद आ गई।आशा है आप लोगों को भी कुछ याद आए या आपके साथ भी क...

रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से

11वीं कक्षा में पानी के होद और सीढ़ियों के पास की हाल (Hall) में हम तीन साथी रहते थे। रघुनाथ विद्यालय छात्रावास के उत्तर साइड में रघुनाथ विद्यालय (जूनियर वर्ग),पूर्व साइड में मुख्य सड़क के पार अग्रसेन भवन और उससे थोड़ा नीचे सदर थाना हुआ करता था। जिसके प्रीतमसिंह जी सोनी‌ शायद SHO हुआ करते थे।दक्षिण साइड में श्री रामचंद्र मंदिर गनेरी वाला और पश्चिम साइड में ऊपर की मंजिल से कुछ घर दिखते थे। कहने का मतलब है शांत और निर्विघ्न वाला स्थान था । 11वीं तक आते-आते मेरी भी किशोरावस्था परवान पर थी। ऐसे में मन में खूब विचार और सपने आते‌ रहते थे। वैसे शुरू से ही मैं एकान्त प्रिय जीव था । विज्ञान का विद्यार्थी था तो किताबों में डूबना भी स्वाभाविक था। फिजिक्स को बार-बार पढ़ते रहता, कभी समझ आती तो कभी झूठी माथा-पच्ची। उलझन भरे पलों में भी कुछ ऐसा था जो सुबह-सुबह देख लेने पर मन में ताजगी पैदा करता था। उनमें एक थे श्री रामचंद्र मंदिर गनेड़ी वाला के महंत जो एक शारीरीक शोष्ठव की अद्भुत मिसाल थे और सुबह-सुबह मंदिर के खूबसूरत उद्यान में घूमते हुए दिखाई देते थे। वहीं दूसरी तरफ पीछे के घर में एक...

रघुनाथ विद्यालय छात्रावास की यादों से

सागै ले  लिन्हो म्है पीपो नाम राखलियो हो दीपो।। बात 1979 की है जब मैंने रघुनाथ विद्यालय रतनगढ़ में प्रवेश लिया था और घर वालों ने बड़े लाड़-प्यार से यह पीपा दिलवाया था। हालांकि आज पीपा मोजूद है, पीपा दिलाने वाले अब इस दुनिया में नहीं हैं। तब यह पीपा ही  रघुनाथ विद्यालय के हॉस्टल में मेरी तिजोरी व मेरा रसोईघर का स्टोर हुआ करता था। इसमें नमक, मिर्च, हल्दी, धनिया की छोटी-छोटी पोटली, आटा की कोथली और घी का छोटा सा डिब्बा रखकर इसके छोटी सी तालकी (छोटा ताला) लगा दिया करता था। इस पीपे की  दास्तान यह है की इसमें घी का डिब्बा रखा तो भरा हुआ जाता था लेकिन हमेशा इसमें से निकलता खाली ही था। खास बात यह भी है कि इसकी तालकी हमेशा एकदम उसी हालत में लगी हुई मिलती थी जैसी मैं लगाकर छोड़ता था। बहुत शातिर दिमाग मिस्त्री थे मेरे हॉस्टल मेट। डर के मारे किसी को बता भी नहीं सकते था कि मेरा घी कोई हलवा बनाकर खा गया। क्योंकि उल्टा मुझ पर ही इल्जाम आना था कि तू अकेले-अकेले ही खाना चाहता है। घी छूमंतर होने के लिए कोई ज्यादा समय नहीं लगता था। जिस दिन लाया उसी दिन या तो जैसे ही क्लास में गया पीछे से...

सुखद संयोग

इस साल पन्द्रह अगस्त ऐसा आया दो माह के शिशु ने यों झंडा फहराया नज़रें सबकी उस पर लगी जब बाहों से झंडा लहराया सफेद लिबास साफ दिल दिल पर तमगा आजादी का जेन जी मां का है लाल विस्मित करता दृश्य कमाल भविष्य की तस्वीर देखकर मैं और  राष्ट्र मालामाल मेरे देश में डाटा बहुत है शक्ति है सही उपयोग नया जमाना नया वृतांत प्यारा सा पल सुखद‌ संयोग।।

मित्रता दिवस पर संस्मरण

१- शायद ग्यारहवीं कक्षा की बात है। एक छुट्टी के दिन हॉस्टल के चार साथियों मल्लू, रामलाल , मैं और एक अन्य को बीकानेर घूमने का फितूर चढ़ा। पैसे तो पास में ज्यादा होते नहीं थे और इसलिए यह तय हुआ कि सुबह की लोकल ट्रेन से बिना टिकट बीकानेर की यात्रा करेंगे और दिनभर बीकानेर की सैर करेंगे और शाम की लोकल ट्रेन (सूरतगढ़  वाली) से वापस आ जाएंगे। एक थैला लिया जिसमें सीट पर बिछानेके लिए एक चद्दर डाल ली और थर्ड क्लास डिब्बे में सवार हो गए। बिना टिकट वाले यात्री हर स्टेशन पर डिब्बे बदलते रहते हैं ताकि टीटीई से बच सके। इस तरह हम चारों दोस्त भी डिब्बे बदलते लेकिन हम पर टीटीई की नजर पड़ गई और उसने पीछा करना शुरू कर दिया। बेलासर स्टेशन‌ से ट्रेन जब रवाना हुई तो टीटीई हमारे डिब्बे में चढ़ता दिखा तो दूसरे दरवाजे से हम चारों नीचे उतर गए और रेलवे स्टेशन के दूसरी तरफ भाग गए।  इस जद्दोजहद में थैला ट्रेन में ही छूट गया। शाम की ट्रेन से वहीं से वापस आ गए। बीकानेर तो नहीं देखा लेकिन ₹100 की चद्दर का नुकसान अवश्य कर आये । यह चद्दर रामलाल की थी।😆 २-रामलाल ने ही मुझको फिल्में देखने का चस्का ...

आहें

शायरी में बातें करके यों हमें बेकरार ना कीजिए कोई दिन अच्छा देख इश्क का इजहार कर दीजिए देगें दुआएं दिल से बस उम्र गुजारने में शरीक हो जाइए भरकर आहों में ही सही थोड़ा सा प्यार करने दीजिए।

उपवास

यह जरूरी नहीं हर उपवास शारीरिक सेहत‌ के लिए ही हो कुछ उपवास सामाजिक सेहत की भेंट भी चढते हैं। मौके ऐसे कि ना उगलते बनता ना निगलते बनता दे दो सारी बधाईयां लेते रहो जम्हाईयां। शिकवों की बातें और सौगातें हैसियत की भेंट चढ़ती पुरानी-नई सब बातें। उठना पड़ता मजबूरी के बहाने ताकते रह जाते चेहरे नये-पुराने जानते वो‌ भी हैं क्या हैं मायने इसे ही कहते हैं पहुंचो ठिकाने। सूकून मिला देख कुछ धोती वाले बीड़ियों के कश में खो गये निवाले सेहत अब वही जो उल्टी (कै) बचायह जरूरी नहीं हर उपवास शारीरिक सेहत‌ के लिए ही हो कुछ उपवास सामाजिक सेहत की भेंट भी चढते हैं। मौके ऐसे कि ना उगलते बनता ना निगलते बनता दे दो सारी बधाईयां लेते रहो जम्हाईयां। शिकवों की बातें और सौगातें हैसियत की भेंट चढ़ती पुरानी-नई सब बातें। उठना पड़ता मजबूरी के बहाने ताकते रह जाते चेहरे नये-पुराने जानते वो‌ भी हैं क्या हैं मायने इसे ही कहते हैं पहुंचो ठिकाने। सूकून मिला देख कुछ धोती वाले बीड़ियों के कश में खो गये निवाले सेहत अब वही जो उल्टी (कै) बचाले। डीजे अब भी कान फाड़े लगता सुनपन रहेगा एक पखवाड़े लिख कर मोहन अब क्या उखाड़े।। वें। डीजे ...

A different smell

A different smell  A different bell Charges me as a cell A different row A different bow Takes me on a toe A different blow A different glow Takes me on a flow Going slow Hiding below Makes me hollow 

Naming Ceremony

Naming Ceremony of my grandson,  on the father's day of the year 2026 i.e. 21.06.2026.

मैं हुआ निहाल

एक नन्हा फरिश्ता आंगन आया सूरज सोने का आज हमने पाया मासूमियत में ओज भरा है आंखों अद्भुत तेज हाथों की मुद्रा से लगता कोई तप तू रहा सहेज तेरह तारीख चार मूलांक दिन का तीन घड़ी सूचकांक जून अंग्रेजी ज्येष्ठ विक्रम कृष्ण पक्ष तेरस वार शनिवार साल छब्बीस संवत दो हजार मेरे घर बजा आज थाल दादू बन मैं हुआ निहाल।।

Pictorial Summary

My Book जसनाथी सम्प्रदाय: आराध्य, आदेश और अग्नि -नृत्य in a pictorial summary. For more details visit amazon.in

तिनकों सहारे सफर

A Cartoon version of My latest book "Tinkaun Sahare Safar" created and shared by a friend of mine Mr Vijay. Beautiful description.