मकर संक्रांति ने लोहड़ी को भी समेट लिया अपने आंचल में खाकर तिल-मूंगफली उसकी चढ़ गये छतों पर पतंगों के जूनून में दुकानें बंद करके लगे इस व्यापार में दो-दो साल के बच्चे भी सीटी वाले जूते पहनकर लगे चरखी को लटाने में लड़कियां बड़ी फुर्ती से पतंगें उड़ाते लगतीं जैसे स्वयं ही पतंगें हो जिनका संतुलन मानो किसी का पोनीटेल, किसी का चोटी में पावर लाईने धागों से फाल्ट हुई पचासों बिजली वाले जुट गये पतंग बनकर हटाने में रात हुई ड्रोन के माफिक गुब्बारों वाले पतंग लगे शहर का आकाश सजाने में नीचे सड़कों पर लोगों ने ऐसी की आतिशबाजी लगा शहर बंट गया है रंग-बिरंगी दीवारों में बचे लोग नजारे ही देखते रहे दिनभर दबा दांतों तले उंगली खाना तो बस आज पड़ा रहा अपने बरतनों में यह शहर है गुलाबीनगर जनाब रंग तो बसा है इसकी हर धड़कन में आतिशबाजी के शोर से शायद आज परिंदों ने बदल लिये ठिकाने इसीलिए आज उनकी बची रहीं जाने।।
यह जरूरी तो नहीं हम चाहें वह हो जाये लगे रहिए पूरी लगन से हो जाये चाहा तो अच्छा नहीं तो तब तक विचार बदल जायें तो और भी अच्छा इसे ही राह कहते हैं आजमाना जमाने से पहले खुद को अच्छा है।।